By Raghu Pandey on 21/04/2015

नेट न्यूट्रालिटी को समझो और एक्शन लो! #SaveTheInternet

iMature supports Net Neutrality in India

(This article was adapted by Outlook Hindi Magazine (16th - 30th April 2015 edition))

बहुत ही टेक्निकल से लगने वाले इस टर्म "नेट न्यूट्रालिटी" का वास्ता आज हर भारतीय से पड़ गया है| कारण है TRAI (टेलिकॉम इंडस्ट्री की लगाम थामने वाली सरकारी संस्था) द्वारा २७ मार्च २०१५ को जारी किया गया एक 'कंसल्टेशन पेपर'। इस पेपर में TRAI ने जनता से २० सवालों पर राय मांगी है जिसका सारांश कुछ ऐसा है - "इंटरनेट के कारण टेलीकॉम कंपनियों के मुनाफे कम हो रहे हैं। तो क्यों न उन्हें वेबसाइट्स और ऍप्स पर थोड़ी सी नकैल कसने और आम ग्राहकों की थोड़ी सी आज़ादी छीनने का अधिकार दे दिया जाये?"। इसके विरोध में ओडिशा से सांसद श्री तथागत सत्पथी ने TRAI को एक खुला पत्र लिख कर "भारत में नेट न्यूट्रालिटी" का पुरजोर पक्ष लिया। बहुत से और भी इंटरनेट के जानकारों ने "नेट न्यूट्रालिटी" का झंडा थाम इसके विरुद्ध हल्ला बोल दिया है।

"नेट न्यूट्रालिटी" आखिर है क्या ? 

यह एक सिद्धांत है जो उन सभी कंपनियों पर लागू होता है जो उपभोक्ताओं को इंटरनेट सेवा प्रदान करती हैं (ISP: इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर)। इसके अनुसार ISP का यह दायित्व है की उपभोक्ताओं द्वारा एक्सेस की जा रही सभी जायज़ वेबसाइटों और ऍप्स को सामान दृष्टि से देखे और किसी भी वेबसाइट या ऍप से भेदभाव न करे, अगर वो गैरकानूनी न हो। अब आप ये पूछेंगे की कोई ISP कंपनी किसी वेबसाइट या ऍप से भेदभाव कैसे करेगी और क्यों? 

पहले "कैसे" को समझते हैं… सभी बड़े ISPs के पास वो टेक्नोलॉजी होती है जिससे वे यह जान सकते हैं की आप इंटरनेट पर कौनसी वेबसाइट या ऍप इस्तेमाल कर रहे हैं। वे चाहें तो किसी एक वेबसाइट को धीमा और दूसरी को तेज़ कर सकते हैं। अर्थात, मान लीजिये आप अपने स्मार्टफोन पर YouTube और WhatsApp पर एक साथ एक ही वीडियो देख रहे हैं। आपका ISP चाहे तो WhatsApp की बैंडविड्थ को घटा कर YouTube को फायदा पहुंचा सकता है। वही वीडियो आपको YouTube पर बिना किसी रुकावट दिखेगा और WhatsApp पर अटक-अटक कर। वो चाहे तो WhatsApp को पूरी तरह से बंद कर सकता है या आपके लिए किसी एक वेबसाइट का इस्तेमाल सस्ता (या मुफ्त) और दूसरी का महंगा कर सकता है। 

लेकिन ISP ऐसा करेगा क्यों ? "भाई मैं डाटा को YouTube की थाली से खाऊं या WhatsApp की थाली से, ISP को तो पैसा बराबर मिलेगा न। तो भेदभाव करने का तो कोई कारण ही नहीं बनता!" ऐसा कई समझदार लोग कहेंगे। आप कारण समझना चाहते हैं तो इस मुद्दे को कंपनियों के मुनाफे की दृष्टि से देखना पड़ेगा। 

कारण न.1 - टेलीकॉम कम्पनियों के मुनाफे का बहुत बड़ा हिस्सा वॉइस कॉल और SMS से आता है। ये वो कॉल और SMS हैं जो आप अपने फ़ोन से करते हैं - बिना किसी ऍप के। इन दोनों ने टेलीकॉम कंपनियों को एक दशक तक अच्छा मुनाफा दिया, पर अब हम ग्राहक अपनी "सीमा" से बाहर होने लगे हैं। हमें Skype, WhatsApp, Viber, Hangout आदि ऐसी ऍप्लिकेशन्स की लत लग गयी है जिससे फ़ोन कॉल और SMS का इस्तेमाल किये बिना ही दूसरों से बातें कर सकते हैं। ये नयी टेक्नोलॉजी पर बनी ऍप्लिकेशन्स डाटा का बेहतर उपयोग करके, फ़ोन कॉल और SMS से बहुत कम खर्च में ही हमारा काम कर देती हैं। उपभोक्ताओं को नए जमाने की मूंगफली पसंद आने लगी तो उन्होंने टेलीकॉम कंपनियों से पुराने जमाने के काजू खरीदना कम कर दिया। 

कारण न.2 - टेलीकॉम कंपनियों को ईर्ष्या होने लगी है गूगल, याहू, व्हाट्सऍप जैसी कंपनियों से, जो अपने ग्राहकों तक पहुँचती हैं टेलीकॉम कंपनियों की पीठ पर बैठ कर लेकिन विज्ञापनों से होने वाली पूरी कमाई खुद रख लेती हैं। 

कारण न.3 - मौका मौका! टेलीकॉम कंपनियों के पास इंटरनेट कंपनियों की आपसी स्पर्धा का फायदा उठा कर पैसा कमाने का बढ़िया मौका है। टेलीकॉम कंपनियों की सबसे बड़ी संपत्ति हैं उसके ग्राहकों का बड़ा सा झुंड। इतने बड़े झुंड को इकठ्ठा हाँक कर अपने पाले में ले आने का लालच वेबसाइट्स और ऍप्स चलाने वाली कंपनियों को हमेशा रहता है। तो फिर उनका और टेलीकॉम कंपनियों का (पर्दे के पीछे) हाथ मिलाना स्वाभाविक है। 

इन्हीं कारणों से … हाल ही में एयरटेल ने अपने ग्राहकों के लिए Skype से बात करना महंगा कर दिया। फेसबुक ने रिलायंस से हाथ मिला कर Internet.org स्कीम शुरू की जिसमे कुछ "चुनिंदा" वेबसाइट्स और ऍप्स के फ्री पैक से ग्राहकों को सम्मोहित किया (और गूगल से दूर किया :))। इसके जवाब में एयरटेल ने "एयरटेल ज़ीरो" स्कीम लॉन्च की जिसमें भी कुछ "चुनिंदा" वेबसाइट्स और ऍप्स को फ्री परोसा गया। MTS, यूनिनॉर और टाटा डोकोमो भी पहले ऐसा कर चुके हैं। २०१३ में वोडाफोन ने ग्राहकों को ट्विटर मुफ्त बाॅंटा और ट्विटर की फीड्स में अपने विज्ञापन दिखाए। 

मुनाफे की चाह अन्य देशों की टेलीकॉम कंपनियों को भी भरपूर है। इसीलिए "सभी वेबसाइट्स और ऍप्स को सामान अधिकार" की बहस भारत से पहले अमेरिका, यूरोप और जापान आदि विकसित देशों में शुरू चुकी है। सभी जगह यह त्रिपक्षीय संघर्ष है - टेलीकॉम कंपनियों, वेबसाइट्स व ऍप्स, और आम उपभोक्ताओं के बीच। अमेरिका में प्रेसिडेंट बराक ओबामा स्वयं नेट न्यूट्रालिटी के समर्थन में आगे आये हैं। भारत में "डिजिटल इंडिया" का महत्वाकांक्षी विज़न देने वाले मोदी जी के विचार अभी आना बाकी हैं। 

एक आम उपभोक्ता व नागरिक की दृष्टि से देखें तो "नेट न्यूट्रालिटी" इक्कीसवीं सदी का एक मौलिक अधिकार है। सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, ज्ञान अर्जन का अधिकार, बोलने का अधिकार, सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने का अधिकार, नौकरी या व्यापार में सामान अवसरों का अधिकार, चुनने का अधिकार… और ऐसे बहुत सारे लोकतांत्रिक अधिकारों के उपयोग के लिए इंटरनेट सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इंटरनेट लोकतांत्रिक सहभागिता की नींव बनता जा रहा है। इस नींव में किसी भी कंपनी या कार्टेल को छेड़छाड़ करने देना एक बहुत बड़ी रिस्क है! वैसे बिज़नेस का कॉमन सेंस भी यही कहता है की टेलीकॉम कंपनियां अगर उपभोक्ताओं के हित को सर्वोपरि रख कर धंधा करें तो उनका भला होगा। और मुनाफा बढ़ाना है तो TRAI की गोद में बैठने की बजाये चार्ल्स डार्विन की क्लास में बैठें … अर्थात इनोवेशन करें और बदलती टेक्नोलॉजी के हिसाब से अपने आप को ढालते रहें। 

अगर आप नेट न्यूट्रालिटी के पक्ष में TRAI को जवाब देना चाहते हैं तो www.savetheinternet.in ने यह काम आपके लिए आसान कर दिया है। याद रखिये जवाब भेजने की आखिरी तारीख २४ अप्रैल २०१५ है।

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